मध्य प्रदेश

जल संरक्षण सिर्फ अभियान नहीं, रोजमर्रा की आदत बने: विशेषज्ञों ने दिए आसान उपाय

Kavita2
6 Oct 2026 10:40 AM IST
जल संरक्षण सिर्फ अभियान नहीं, रोजमर्रा की आदत बने: विशेषज्ञों ने दिए आसान उपाय
x

इंदौर। जल संकट की बढ़ती चुनौती के बीच विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि पानी बचाने को केवल जागरूकता अभियानों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे रोजमर्रा की जीवनशैली का हिस्सा बनाया जाए। सोमवार को इंदौर मैनेजमेंट एसोसिएशन (IMA) महिला फोरम के ‘बियॉन्ड द ड्रॉप’ जल संरक्षण चैलेंज के समापन कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि घरों, दफ्तरों और संस्थानों में छोटे-छोटे बदलाव करके बड़ी मात्रा में पानी बचाया जा सकता है।

कार्यक्रम का उद्देश्य जल संरक्षण को लेकर ऐसे व्यावहारिक और नवाचारी विचार सामने लाना था, जिन्हें लोग बिना बड़े खर्च के अपने दैनिक जीवन में लागू कर सकें। अलग-अलग प्रतिभागियों ने पानी की बर्बादी रोकने, घरेलू जल उपयोग को बेहतर बनाने और इस्तेमाल किए गए पानी के दोबारा उपयोग से जुड़े सुझाव प्रस्तुत किए।

मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. दिलीप वाघेला और बिजनेस ऑटोमेशन विशेषज्ञ सुषमा नंदी कार्यक्रम की जूरी में शामिल थे। उन्होंने प्रतिभागियों के विचारों का मूल्यांकन उपयोगिता, नवाचार और उन्हें वास्तविक जीवन में लागू किए जाने की संभावना के आधार पर किया। जूरी ने ऐसे सुझावों को प्राथमिकता दी जो तकनीक और व्यवहार, दोनों स्तरों पर पानी की बचत में मदद कर सकें।

कार्यक्रम में डॉ. नूपुर थानवी ने घरेलू स्तर पर पानी बचाने के कई सरल और प्रभावी तरीके सुझाए। उन्होंने कहा कि अक्सर घरों में पानी की सबसे ज्यादा बर्बादी ओवरहेड टैंक भरते समय होती है। इसे रोकने के लिए टैंक में अल्ट्रासोनिक वॉटर-लेवल मॉनिटरिंग सिस्टम लगाया जा सकता है। यह सिस्टम पानी के स्तर की जानकारी देकर ओवरफ्लो को रोकने में मदद कर सकता है।

डॉ. थानवी ने कहा कि कई घरों में पानी की मोटर समय पर बंद न होने के कारण रोजाना काफी पानी बह जाता है। यदि जल स्तर पर नजर रखने के लिए तकनीक का उपयोग किया जाए तो इस बर्बादी को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि घरों में ऐसे सेंसर और अलर्ट सिस्टम को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जो टैंक भरने पर लोगों को तुरंत सूचना दे सकें।

वॉशिंग मशीन के उपयोग को लेकर भी उन्होंने अहम सुझाव दिए। उनका कहना था कि वॉशिंग मशीन को आधी क्षमता पर बार-बार चलाने के बजाय पूरी तरह भरने के बाद इस्तेमाल करना चाहिए। इससे पानी के साथ बिजली की भी बचत होती है। छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करके परिवार मासिक स्तर पर पर्याप्त मात्रा में जल बचा सकते हैं।

कपड़े धोने के बाद बचने वाले पानी के दोबारा उपयोग पर भी कार्यक्रम में विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि इस पानी को सीधे नाली में बहाने के बजाय फर्श की सफाई, खुले क्षेत्रों को धोने या दूसरे गैर-पेय कार्यों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे साफ पानी की खपत कम होगी और एक ही पानी का एक से अधिक बार उपयोग संभव हो सकेगा।

कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि जल संरक्षण की चर्चा अक्सर गर्मियों या पानी की कमी के दौरान तेज होती है, लेकिन इसका असर तभी दिखाई देगा जब इसे पूरे साल अपनाया जाए। घर में नल से पानी टपकना, जरूरत से ज्यादा पानी बहाना, वाहनों की धुलाई में पाइप का लगातार उपयोग और छोटी जरूरतों के लिए भी ताजा पानी इस्तेमाल करना ऐसी आदतें हैं, जिनमें बदलाव की आवश्यकता है।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि लोगों को पानी के इस्तेमाल का नियमित आकलन करना चाहिए। जिस तरह बिजली के बिल से परिवार यह समझते हैं कि उनकी ऊर्जा खपत कितनी है, उसी तरह पानी की खपत पर भी ध्यान देना जरूरी है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि किन कार्यों में जरूरत से ज्यादा पानी खर्च हो रहा है और उसे कैसे कम किया जाए।

‘बियॉन्ड द ड्रॉप’ चैलेंज में तकनीक के उपयोग के साथ व्यवहार में बदलाव को भी जरूरी बताया गया। जूरी सदस्यों ने माना कि केवल बड़े प्रोजेक्ट या सरकारी योजनाएं ही जल संकट का समाधान नहीं कर सकतीं। घरों और संस्थानों में लाखों लोग अगर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पानी बचाएं तो सामूहिक स्तर पर इसका बड़ा प्रभाव हो सकता है।

शहरी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती आबादी और भूजल पर दबाव के कारण जल संरक्षण का महत्व और बढ़ गया है। कई शहरों में गर्मियों के दौरान पानी की आपूर्ति प्रभावित होती है। ऐसे में वर्षा जल संचयन, पानी के पुन: उपयोग और घरेलू स्तर पर बर्बादी रोकने जैसे उपाय भविष्य की जरूरत बनते जा रहे हैं।

विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों और युवाओं को भी जल संरक्षण की आदतों से जोड़ना जरूरी है। यदि स्कूल और घर के स्तर पर बच्चों को पानी का महत्व समझाया जाए और उन्हें छोटी उम्र से ही बचत की आदत डाली जाए तो लंबे समय में इसका बड़ा असर हो सकता है।

कॉरपोरेट और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भी पानी बचाने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। कार्यालयों में सेंसर आधारित नल, जल उपयोग की निगरानी और रिसाइकिलिंग सिस्टम जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे रोजाना होने वाली अनावश्यक खपत में कमी लाई जा सकती है।

कार्यक्रम के दौरान सामने आए विचारों का मुख्य संदेश यही रहा कि जल संरक्षण किसी एक विभाग, संस्था या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। हर व्यक्ति को अपनी दैनिक आदतों में बदलाव करना होगा। तकनीक इसके लिए सहायक साधन बन सकती है, लेकिन सबसे जरूरी है पानी के प्रति जिम्मेदार व्यवहार।

IMA महिला फोरम के ‘बियॉन्ड द ड्रॉप’ जल संरक्षण चैलेंज का समापन इसी संदेश के साथ हुआ कि पानी बचाने के लिए बड़े बदलाव का इंतजार करने के बजाय छोटे स्तर से शुरुआत की जाए। टैंक का ओवरफ्लो रोकना, वॉशिंग मशीन का सही इस्तेमाल और इस्तेमाल किए गए पानी को दोबारा उपयोग में लाना जैसे कदम सामान्य दिखाई दे सकते हैं, लेकिन बड़ी आबादी द्वारा इन्हें अपनाए जाने पर जल संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।

Next Story